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आध्यात्मिक विकास

ब्रह्मसूत्र और सारनाम दिक्षा

सत्गुरू रणदीप जी बताते हैं कि परमत्ता शब्दों से परे हैं जहाँ तक शब्द हैं, वहाँ तक माया है। आज जो मानव की स्थिति है वह बहुत गिर चुकी है उसे शब्दों से परे एकदम नही ले जाया जा सकता। इसलिए गुरूजी जीव के कल्याण के लिए एक विधि का उपयोग करते हैं जिसे ब्रह्मसूत्र सारनाम दिक्षा कहते हैं। इस दिक्षा में गुरूजी साधक को एक सूत्र प्रदान करते हैं इस सूत्र को लगातार जपने से साधक की कुण्डलीनी शक्ति उध्र्वगामी होने लगती है और उसे दिव्य अनुभव घटने लगते हैं। यह ब्रह्मसूत्र जीव और ब्रह्म के बीच में डोर का काम करता है जिसके सहारे वह अपने लक्ष्य पर पहुंच जाता है।

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गौरवशाली सेवादार बनें- श्रीगोविंदधाम गतौली, जींद हरियाणा में हजारों की संख्या में सेवादार कार्यरत हैं। ये सभी सेवादार गुरूजी के आदेश अनुसार पूरी निष्ठा के साथ सेवादान कर रहे हैं। गुरूजी बताते हैं कि सेवा, सत्संग, सुमिरन और समर्पण इन चार चीजों का परमात्मा तक पहुंचने में विशेश योगदान होता है। इनमें सेवा सबसे पहला अंग है, जो तन, मन, धन से धाम के कार्यों के लिए सदैव तत्पर है। वहीं सच्चा सेवादार है।